Last updated on July 9th, 2024 at 10:59 am
स्ट्रॉबेरी की खेती कैसे करें Strawberry Farming Business Hindi
Strawberry farming business plan pdf स्ट्रॉबेरी एक स्वादिस्ट फल है जो बिलकुल नाजुक फल होता है इस फल के लिए दुनिया भर में खेती की जाती है और इंडिया के अन्दर भी Strawberry Farming अच्छे लेवल पर होती है लेकिन Strawberry की 600 किस्में दुनिया में मौजूद है. ये सभी अपने स्वाद रंग रूप में एक दूसरे से भिन्न होती है. Strawberry में अपनी एक अलग ही खुशबू के लिए पहचानी जाती है |
स्ट्रॉबेरी में कई सारे विटामिन और लवण होते है जो स्वास्थ के लिए काफी लाभदायक होते है. इसमें काफी मात्रा में विटामिन C एवं विटामिन A और K पाया जाता है इसलिए बहुत से लोग स्ट्रॉबेरी खाते है और इनके आलवा इसमें केल्सियम मैग्नीशियम फोलिक एसिड फास्फोरस पोटेशियम होता है इसलिए Strawberry की इतनी ज्यादा डिमांड है और बहुत से लोग Strawberry फार्मिंग से लाखो रुपये कमाते है | Strawberry farming profit per acre in india
| S.No. | तत्व | मात्रा |
| 1. | पानी | 89.9 ग्राम |
| 2. | प्रोटीन | 0.7 ग्राम |
| 3. | वसा | 0.5 ग्राम |
| 4. | कार्बो हाइड्रेट | 8.4 ग्राम |
| 5. | विटामिन ए | 6.0 अं. इ. |
| 6. | थायोमिन बी0. | 0.3 मिलीग्राम |
| 7. | राईबोफ्लेबिन बी | 0.07 मिलीग्राम |
| 8. | नियासीन | 0.60 मिलीग्राम |
| 9. | एस्कार्निक एसिड (विटामिन सी) | 59.0 मिलीग्राम |
| 10. | कैल्शियम | 21.0 मिलीग्राम |
| 11. | फास्फोरस | 21.0 मिलीग्राम |
| 12. | लोहा | 1.0 मिलीग्राम |
| 13. | सोडियम | 1.0 मिलीग्राम |
| 14. | पोटैशियम |
भारत में स्ट्रॉबेरी की अधिकतर किस्में बाहर से मगवाई हुई है. व्यावसायिक रूप से खेती करने के लिए प्रमुख किस्में निम्नलिखित है : ओफ्रा, कमारोसा, चांडलर, स्वीट चार्ली, ब्लेक मोर, एलिस्ता, सिसकेफ़, फेयर फाक्स आदि किस्में है. Strawberry Farming Business Hindi
Soil and climatic requirements for growing strawberries :- स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए न ज्यादा गर्मी की जरुरत न ही ज्यादा ठण्ड होनी चाहिए एक अनुकूल तापमान के अन्दर strawberries की खेती की जा सकती है लेकिन वैसे ठंडा मौसम होनी चाहिए Strawberry Farming के दौरान तापमान, फोटोपेरोड और प्रकाश की तीव्रता जैसे पर्यावरणीय मापदंडों का अत्यधिक महत्व है। अधिकतम दिन का तापमान 22 से 25 dayC और रात का तापमान लगभग 7 से 13˚C होना चाहिए
मिट्टी में पानी की कमी के कारण Strawberry के पौधों को कभी भी गलने नहीं देना चाहिए, इसलिए पौधों को पर्याप्त मात्रा में पानी की आपूर्ति की जानी चाहिए। सर्दियों के वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों या क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान पूरक सिंचाई प्रदान की जाती है।
पौधों को लगभग 5 से 5.5 की औसत पीएच रेंज के साथ अच्छी तरह से सूखा रेतीले दोमट या दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। यदि रोपण से पहले भूमि को अच्छी तरह से तैयार किया जाता है और यदि पर्याप्त मात्रा में खाद या जैविक खाद को मिट्टी में मिलाया जाता है, तो पौधों को मिट्टी में भी उगाया जा सकता है। मिट्टी जो प्रकृति में बहुत खारा है और जल भराव की समस्या है, Strawberry Farming के लिए उपयुक्त नहीं है।
Land preparation and planting of Strawberries :- स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए चयनित भूमि में पर्याप्त वायु और जल निकासी की सुविधा होनी चाहिए जो जमीन पहले टमाटर, आलू, काली मिर्च, और बैंगन, इत्यादि जैसे विलायती फसलों के रोपण के लिए उपयोग की जाती थी, उन्हें Strawberry Farming के लिए इस्तेमाल ना करे
खेत में आवश्यक खाद् उर्वरक देने के बाद बेड बनाने के लिए बेड की चौड़ाई 2 फिट रखे और बेड से बेड की दूरी डेढ़ फिट रखे. बेड तैयार होने के बाद उस पर ड्रेप एरिगेशन की पाइपलाइन बिछा दे. पौधे लगाने के लिए प्लास्टिक मल्चिंग में 20 से 30 सेमी की दूरी पर छेद करे और Strawberry की बिजाई का सही समय 10 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक सही है Strawberry farming profit per acre in india
स्ट्रॉबेरी के पौधों को रोपने का सही समय जलवायु पर निर्भर करता है उत्तरी भारत में इसकी रोपाई सितंबर से नवंबर के मध्य की जा सकती है| रोपण करते समय यह ध्यान रहे कि रनर्स स्वस्थ तथा कीट एवं रोगरहित होने चाहिए
यह पौधों के रोपण की दूरी, उगाई जाने वाली किस्म, मृदा की भौतिक दशा, रोपण विधि और उगाने की दशा इत्यादि पर निर्भर करता है कुछ स्थानों पर इसके रोपण की दूरी 30 X 60 सेंटीमीटर रखते हैं| इससे प्रति हैक्टर लगभग 55 हजार से 60 हजार पौधों की जरूरत होती है| अधिक उपज लेने के लिए पौधे से पौधे एवं कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाती है| यदि इस दूरी पर पौधों का रोपण करते हैं, तो एक हैक्टर के लिए लगभग 1 लाख 11 हजार पौधों की जरूरत होती है|
खाद एवं उर्वरकों के उपयोग का मुख्य उद्देश्य पौधों के समुचित विकास और बढ़वार के साथ ही मृदा में अनुकूल पोषण दशाएं बनाए रखना होता है और Strawberry Farming में जमीन तैयार करने के दौरान पहले से ही लगाए जाने के बाद चूने और फॉस्फोरस तत्वों को खेत में नहीं डालना चाहिए। पूरे खेती के मौसम में नाइट्रोजन और पोटेशियम उर्वरकों का उपयोग करके खेत को पूरक बनाया जाना चाहिए।
हमेशा खेत की मीट्टी जांच के उपरांत ही खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए| सामान्यतः खेत तैयार करते समय 10 से 12 टन कम्पोस्ट खाद, 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फॉस्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की दर से डालनी चाहिए| इसमें फर्टिगेशन के रूप में एन पी के 19:19:19 की 25 ग्राम मात्रा प्रति वर्गमीटर की दर से सम्पूर्ण फसल चक्र में देनी चाहिए| यह मात्रा 15 दिनों के अंतराल पर 4 से 5 भागों में बांटकर देनी चाहिए| Strawberry में सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव भी उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है|
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स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाने के कुछ समय खरपतवार उग जाते है जो पौधे को नुकसान पहुंचाते है और बीमारी लेके आते और इसके साथ ही ये विभिन्न प्रकार के कीट एवं रोगों को आश्रय प्रदान करते हैं| अक्टूबर में रोपित पौधों से नवंबर में फुटाव शुरू हो जाता है| फुटाव शुरू होने पर खेत की निराई-गुड़ाई करके खरपतवार निकाल देने चाहिए Strawberry farming profit per acre in india
सिंचाई का समय और आवृत्ति कुछ कारकों पर निर्भर करती है जैसे मिट्टी का प्रकार, पानी की गुणवत्ता, स्थान का मौसम, मौसम, फल का प्रकार, गीली घास सामग्री और सिंचाई प्रणाली के प्रकार। यदि रोपण मृदा मिट्टी पर किया जाता है, तो नियमित समय पर पानी की आपूर्ति कम मात्रा में की जाती है पहली सिंचाई पौध रोपण के तुरंत पश्चात कर देनी चाहिए| उसके बाद 2 से 3 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें|
स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए विभिन्न सिंचाई प्रणाली जैसे ओवरहेड स्प्रिंकलर, माइक्रो-स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई का उपयोग किया जा सकता है। यदि एक ड्रिप सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है इसमें प्लास्टिक लाइनों द्वारा पानी पौधों की जड़ों में सीधा तथा समान रूप से पहुंचाया जा सकता है इसमें 2 से 4 लीटर प्रति घंटा चलता है | strawberry farming in uttar pradesh
इस सिस्टम के बहुत से फायदे है जैसे ड्रिप सिंचाई प्रणाली में जल के साथ-साथ उर्वरक, कीटनाशक व अन्य घुलनशील रासायनिक तत्वों को भी सीधे पौधों तक पहुंचाया जा सकता है| जब पानी के साथ-साथ पोषक तत्व भी पौधों को उपलब्ध कराए जाते हैं, तो उसे फर्टिगेशन (फर्टिलाइजर+इरीगेशन) के नाम से जाना जाता है| फर्टिगेशन में पूर्णतः घुलनशील या तरल उर्वरक का ही प्रयोग किया जा सकता है|
रोग सामान्य रूप से उन पौधों में होते हैं जहाँ वर्षा सामान्य से अधिक होती है। Strawberry के पौधों में पाए जाने वाले कुछ सामान्य रोगों को पत्तेदार फफूंदी, पत्ती झुलसा और धब्बे जैसे पर्ण रोगों में वर्गीकृत किया जाता है; जड़ से जुड़ी बीमारियाँ जैसे वर्टिसिलियम विल्ट, ब्लैक रूट रोट, रेड स्टेल आदि; फलों के छिलके जैसे ग्रे मोल्ड, एन्थ्रेक्नोज, राइजोपस, लेदर रोट आदि।
इन सभी को या तो उचित रासायनिक उपचार विधियों का उपयोग करके नियंत्रित किया जा सकता है या सांस्कृतिक तरीकों जैसे उचित पौधे के इस्तेमाल से रोका जा सकता है इसमें कीट एवं रोगों की पहचान इस प्रकार से किया जाता है जैसेः
पर्णजीवी (थ्रिप्स)- यह हल्के पीले और भूरे रंग का किट होता है और यह Strawberry की पत्तियों एवं पुष्पन से रस चूसते है जिसे पौधा कमजोर हो जाता है इसके नियंत्रण के लिए Imidacloprid 2 मिलीलीटर या Dimethoate 30 ई सी एक मिलीलीटर या Confidor 1.5 मिलीलीटर दवा का प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें|
लाल मकड़ी- यह एक लाल रंग की मकड़ी होती है जो पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं| इससे पत्तों पर धब्बे बन जाते हैं इसके नियंत्रण के लिए पौधों पर सल्फर 1.5 से 2 ग्राम या ओमाइट एक मिलीलीटर या कैल्थेन 18.5 ई सी 1 से 2 मिलीलीटर या आबामेक्टिन 1.9 ई सी एक मिलीलीटर दवा का प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें|
फफूद या छाछ्या :- इस प्रकार के रोग में स्ट्रॉबेरी की पत्तियों के ऊपर बैंगनी रंग के धब्बे हो जाते है इसकी रोकथाम के लिए केराथेन 0.1 प्रतिशत या केलिक्सिन 0.1 प्रतिशत या घुलनशील गंधक 0.2 प्रतिशत घोल का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें|
एंथ्रेक्नोज (श्यामव्रण) एवं फल सड़न – इस बीमारी के अन्दर Strawberry की पत्तियों पर हल्के, गहरे काले रंग के धब्बे हो जाते है जिस से फल खराब होने लगते है इसके नियंत्रण के लिए एक तो सफाई रखे खरपतवार न होने दे दूसरा कार्बेन्डाजिम दवा 200 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर 10 से 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें|
Strawberry फल आमतौर पर सुबह-सुबह या देर दोपहर के दौरान तापमान कम होने पर हाथ से काटा जाता है। पूर्ण परिपक्वता प्राप्त करने के बाद ही फल चुने जाते हैं यानी फलों का स्वाद मीठा और रंग लाल होता है। कटाई सप्ताह में या हर दूसरे दिन दो बार की जाती है। फल को उठाते हुए उंगली और अंगूठे का उपयोग किया जाना चाहिए। फल को तने से लगभग 2 सें.मी. घुमाकर अलग किया जाता है। उठाते समय ध्यान रखना चाहिए कि फलों को नुकसान न पहुंचे और इसलिए उन्हें स्टैकिंग के बिना कंटेनरों में रखा जाता है।
जो फल ओवररिप होते हैं, उन्हें अलग से संग्रहित किया जाना चाहिए। एकत्रित फलों को धूप, गर्म हवा और गंदगी से बचाना चाहिए। छोटे और बड़े फलों को भी अलग से संभाला जाना चाहिए। फल फरवरी-अप्रैल के दौरान मैदानी क्षेत्रों में और मई-जून के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में पकते हैं।
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